बोस की पुण्यतिथि पर जानिए उनके जीवन के कुछ रहस्यमई कहानियां

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Bose's death anniversary

नई दिल्ली/आर्ची तिवारी। भारत के वीर सपूत सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु 18 अगस्त 1945 में एक विमान हादसे के दौरान हुई थी। हालांकि, विमान हादसे की घटना रहस्यमई है। लोग भी नेताजी की मौत को एक पहेली बताते हैं, जिसको आज तक कोई सुलझा नहीं सका। तो यह जानते हैं, उनकी मौत से जुड़े कुछ किस्से, कहानियां और कुछ गूढ़ रहस्य।

18 अगस्त 1945 को हुआ था हादसा

सूत्रों के अनुसार 18 अगस्त 1945 को नेताजी ने ताइवान से जापान के लिए उड़ान भरी थी। लेकिन उनका विमान ताइवान की राजधानी ताइपे में ही दुर्घटनाग्रस्‍त हो गया। वह टोक्‍यो जा रहे थे। विमान में अचानक से तकनीकी खराबी आ जाने के कारण आग लग गई और जलते-जलते वह क्रैश हो गया। बताया जाता है कि विमान हादसे में नेताजी बुरी तरह जल गए थे। जिसके बाद जापान के एक अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अपना दम तोड़ दिया।

उसके बाद नेताजी का अंतिम संस्कार जापान में ही हुआ। माना जाता है कि उनकी अस्थियां वगैरा सब कुछ जापान के रेकाॅजी मंदिर में विसर्जित कर दी गई‌। हालांकि, इस बात को लेकर लोगों के मन में बहुत आशंकाएं भी हैं, इसीलिए इस कथन को कोई सत्य मानता है तो कोई झूठ।

आपको बता दें कि सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु को लेकर कई कहानियां बताई जाती हैं। बहुत लोगों को आशंकाएं हैं कि विमान हादसे में सुभाष चंद्र बोस घायल हुए भी थे कि नहीं। वहीं सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु को लेकर भारत सरकार ने कई समितियों का भी गठन किया। लेकिन आज तक कोई भी बोस की मृत्यु की पहेली न सुलझ सका।

गुमनाम बाबा बंद कर रहते थे बोस

कहा जाता है कि नेताजी, गुमनामी बाबा बनकर फैजाबाद में लंबे समय तक रहे। 1985 में जब गुमनामी बाबा की मृत्यु हुई तो उनके सामान को देखकर सब दंग रह गए। गुमनामी बाबा फर्राटेदार अंग्रेजी, बांग्ला और जर्मन बोलते थे। उनके पास महंगी सिगरेट, शराब, अखबार, पत्रिकाएं आदि थीं। उनके सामान से नेताजी की निजी तस्वीरें भी मिलीं जिससे कयास लगाए गए कि वही नेताजी थी। रॉलेक्स की घड़ी, आजाद हिंद फौज की यूनीफॉर्म, 1974 में आनंद बाजार पत्रिका में छपी 24 किस्तों वाली ‘विमान दुर्घटना की कहानी’, शाहनवाज और खोसला आयोग की रिपोर्ट, आदि मिले। कहते हैं गुमनामी बाबा का अंतिम संस्कार उसी जगह किया गया जहां भगवान श्रीराम ने जल समाधि ली थी

गांधी ने बोस को इस उपाधि से नवाजा

महात्मा गांधी सुभाष चंद्र बोस से बहुत प्रभावित रहते थे। हालांकि बोस और महात्मा गांधी की विचारधारा में जमीन आसमान का फर्क था। लेकिन फिर भी गांधी बोस के अंदर देश प्रेम की भावना को देखते हुए उनकी हमेशा सराहना करते थे। गांधी जी ने नेताजी को ‘देशभक्‍तों के देशभक्‍त’ की उपाधि से नवाजा था। दिल्‍ली में संसद भवन में उनका विशालकाय पोर्टेट लगा है, तो पश्चिम बंगाल विधानसभा भवन में उनकी प्रतिमा लगाई गई है।

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