Thursday, August 11, 2022
Home रहस्य इस मंदिर में आखि़र क्यों रोते हैं भगवान, वैज्ञानिक भी नहीं उठा पाए इस रहस्य से पर्दा

इस मंदिर में आखि़र क्यों रोते हैं भगवान, वैज्ञानिक भी नहीं उठा पाए इस रहस्य से पर्दा

by pratibimbnews
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नई दिल्ली दीक्षा शर्मा। भारत में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनका रहस्‍य आज भी लोगों के लिए एक अनसुलझी पहेली है कहने का अर्थ है कि ये मंदिर समझ से परे हैं. अपने अक्सर सुना होगा कि जब कोई भक्त संकट में पड़ता है तो वह सिर्फ़ भगवान को याद करता हुए रोता है. लेकिन इस मंदिर में इसका विपरीत है, यहां भक्तों पर आने वाले संकट से पहले ही बाबा भैरव रो देते हैं. यहां आसपास के क्षेत्रों में जैसे ही कोई परेशानी आनी वाली होती है तो भैरव बाबा की मूर्ति से आंसू गिरना शुरू हो जाते है. स्थानीय लोगों को संकट के आने का अंदाज़ा हो जाता है. हालंकि इन आंसुओ के पीछे का रहस्य आज तक किसी को नहीं पता चला. आपको बता दें कि यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में मौजूद है.

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विशेष पूजा – अर्चना

बज्रेश्वरी देवी मंदिर में स्थापित भैरव बाबा की प्रतिभा 5 हज़ार साल से भी ज्यादा पुरानी है.
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि जब भी उन्‍हें प्रतिमा से आंसू गिरते हुए दिखते हैं वह भक्‍तों के संकट काटने के लिए प्रभु की विशेष पूजा-अर्चना शुरू कर देते हैं.  इसके अलावा इस मंदिर में भव्य हवन का आयोजन किया जाता है. पूजा- अर्चना करने का पीछे का कारण यह बताया जाता है कि भैरव बाबा भक्तों पर आने वाली परेशानियों को टाल देते हैं. यह एक शक्ति पीठ है, जहां माता सती का दाहिना वक्षस्थल गिरा था. इसलिए इसे स्तनपीठ भी कहा जाता है. स्तनभाग गिरने पर वह शक्ति जिस रूप में प्रकट हुई वह बज्रेश्वरी कहलाती हैं. मंदिर परिसर में ही भगवान लाल भैरव का नहीं मंदिर है.

तीन धर्मों का प्रतीक

इस मंदिर तीन धर्मों का प्रतीक के रूप में माता की तीन पिण्डियों की पूजा की जाती है. इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां केवल हिन्दू है नहीं बल्कि मुस्लिम और सिख धर्म के लोग भी यहां आकर पूजा अर्चना करते हैं. कहा जाता है कि ब्रजेश्वरी देवी मंदिर के तीन
गुंबद इन तीन धर्मों के प्रतीक हैं.

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1976-77 हुआ था अग्निकांड

कहां जाता है कि साल 1976-77 में इस मूर्ति में आंसू व शरीर पर पसीना निकला था. उस समय
कांगड़ा बाज़ार में भीषण अग्निकांड हुआ था. इस कांड से काफी दुकानें जल गई थी. उसके बाद से यहां ऐसी विपत्ति टालने के लिए हर साल नवंबर और दिसंबर के मध्य में भैरव जंयती भी मनाई जाती है. इस दौरान यहां भव्य हवन का आयोजन होता है.

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