क्या आप जानते हैं कि गंगा जी का नाम जाह्नवी क्यों पड़ा, जानिए रहस्य

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नई दिल्ली/आर्ची तिवारी। वाल्मीकि रामायण और भागवत पुराण के अनुसार सतयुग में जब श्री राम जी के पूर्वज महाराज सगर के पुत्रों को कपिल मुनि के द्वारा श्राप मिला था तब वे सभी 60,000 पुत्र क्षण भर में ही कपिल मुनि के आश्रम में भस्म हो गये. कपिल मुनि का आश्रम रसातल में था और सभी पुत्रों के श्राप से भस्म होने के कारण सगर के परपौत्र भगीरथ ने कड़ी तपस्या करने की सोची. भगीरथ वह तपस्या अपने 60,000 पूर्वजों के उद्धार के लिए करना चाहते थे. ब्रह्म जी के अनुसार सगर के 60,000 पुत्रों की आत्मा को तभी शान्ति मिलेगी जब उनकी अस्थियां गंगा जी के निर्मल पानी से शुद्ध हो जाएगी.

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सागर के पौत्र अंशुमान ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए ब्रह्मा जी की कड़ी तपस्या की परंतु ब्रह्म उनकी तपस्या से संतुष्ट न होकर उन्हें दर्शन नहीं दिया. फिर अंशुमान के पुत्र दिलिप ने भी तपस्या करते करते अपने प्राण त्याग दिए. उनके बाद भगीरथ जो दिलिप का पुत्र था, उसने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए कई वर्षों तक ब्रह्म जी की तपस्या की. ब्रह्म जी भगीरथ से प्रसन्न होकर भगीरथ को दर्शन दिया तब भगीरथ ने गंगा को वरदान स्वरूप मांगा था.

फिर गंगा जी के भयानक वेग के कारण भगीरथ को उनके धरती पर ठहरने की कोई जगह न मिली तब शंकर जी को उपयुक्त मानकर भगीरथ ने महादेव की तपस्या की. महादेव ने प्रसन्न होकर भगीरथ को वचन दिया कि वे गंगा जी को अपनी जटाओं में स्थान देंगे तब गंगा जी अपने प्रबल वेग से शिव जी की जटाओं में समा गई तब शिव जी के द्वारा अपनी एक जटा खोलने से गंगा जी की धारा प्रथ्वी पर गिरी तब आगे आगे भगीरथ और पीछे पीछे गंगा जी पथ बनाते हुए रसातल में जाकर भगीरथ के पूर्वजों को तृप्ति दी और स्वर्ग पहुंचाया.

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पर जब गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चल रही थी तब उसी पर पर जनु नाम के राजा एक कठोर तपस्या में लीन थे पर गंगा जी ने अपने प्रवाह में उनके आश्रम को तहस नहस कर दिया. तब महात्मा जनु ने क्रोध में आकर गंगा जी को पी लिया फिर भगीरथ और देवताओं की याचना करने के बाद उन्होंने अपने कान से गंगा जी को निकाल दिया। तब से गंगा जी राजा जनु की पुत्री कहलाने लगीं और तभी से ही गंगा जी का दूसरा नाम जाह्नवी पड़ गया था.

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